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हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा प्राप्त कराया- पुरुषोत्तम दास टंडन की जीवन कहानी -Purushottam Das Tandon in Hindi

पुरुषोत्तम दास टंडन Purushottam Das Tandon in Hindi उत्तर प्रदेश, भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्हें हिंदी के लिए भारत की राजभाषा का दर्जा प्राप्त करने के प्रयासों के लिए व्यापक रूप से याद किया जाता है। उन्हें राजर्षि की उपाधि दी गई। उन्हें लोकप्रिय रूप से यूपी गांधी के रूप में जाना जाता था।

पुरुषोत्तम दास टंडन उत्तर प्रदेश, भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्हें हिंदी के लिए भारत की राजभाषा का दर्जा प्राप्त करने के प्रयासों के लिए व्यापक रूप से याद किया जाता है। उन्हें राजर्षि की उपाधि दी गई। उन्हें लोकप्रिय रूप से यूपी गांधी के रूप में जाना जाता था।

Purushottam Das Tandon in Hindi

पुरुषोत्तम दास टंडन की जीवन कहानी Purushottam Das Tandon in Hindi



जन्म: 1 अगस्त 1882, प्रयागराज
निधन: 1 जुलाई 1962
माता-पिता: सालिग राम टंडन
पुरस्कार: भारत रत्न

प्रारंभिक जीवन/Purushottam Das Tandon early life


पुरुषोत्तम दास टंडन का जन्म 1 अगस्त, 1882 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा इलाहाबाद स्थित सिटी एंग्लो वर्नाक्यूलर स्कूल में हुई। सन 1894 में उन्होंने इसी स्कूल से मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की। हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उनका विवाह मुरादाबाद निवासी चन्द्रमुखी देवी के साथ करा दिया गया।


सन 1899 में वे कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए और उसी साल इण्टरमीडिएट की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। सन 1900 में उनकी पत्नी ने एक कन्या को जन्म दिया। लगभग इस दौरान वे स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हो गए। इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के म्योर सेण्ट्रल कॉलेज में दाखिला लिया परन्तु अपने क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण उन्हें सन 1901 में कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया। वर्ष 1903 में उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। इन सब कठिन परिस्थितियों के मध्य उन्होंने 1904 में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने इतहास विषय में स्नातकोत्तर किया और फिर कानून की पढ़ाई करने के बाद सन 1906 में वकालत प्रारंभ कर दिया। इसके पश्चात वे उस समय के प्रसिद्ध अधिवक्ता तेज बहादुर सप्रू के देख-रेख में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत करने लगे। स्वाधीनता आन्दोलन और सामाजिक गतिविधियों के लिए उन्होंने सन 1921 में अपनी वकालत छोड़ दी।


राजनैतिक जीवन/Purushottam Das Tandon Political life


सन 1905 में उनके राजनीतिक जीवन का प्रारंभ हुआ जब बंगाल विभाजन के विरोध में समूचे देश में आन्दोलन हो रहा था। बंगभंग आन्दोलन के दौरान उन्होंने स्वदेशी अपनाने का प्रण किया और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार प्रारंभ किया।
Purushottam Das Tandon in Hindi

अपने विद्यार्थी जीवन में ही सन 1899 में वे कांग्रेस पार्टी का सदस्य बन गए थे। सन 1906 में उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति में इलाहाबाद का प्रतिनिधित्व किया। कांग्रेस पार्टी ने जलियाँवालाबाग कांड के जांच के लिए जो समिति बनाया था उसमे पुरुषोत्तम दास टंडन भी शामिल थे। वे लोक सेवक संघ का भी हिस्सा रहे थे। 1920 और 1930 के दशक में उन्होंने असहयोग आन्दोलन और नमक सत्याग्रह में भाग लिया और जेल गए। सन 1931 में गाँधी जी के लन्दन गोलमेज सम्मलेन से वापस आने से पहले गिरफ्तार किये गए नेताओं में जवाहरलाल नेहरु की साथ-साथ वे भी थे।


पुरुषोत्तम दास टंडन कृषक आंदोलनों से भी जुड़े रहे और सन 1934 में बिहार प्रादेशिक किसान सभा का अध्यक्ष भी रहे। वे लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित लोक सेवा मंडल का भी अध्यक्ष रहे।

वे यूनाइटेड प्रोविंस (आधुनिक उत्तर प्रदेश) के विधान सभा का 13 साल (1937-1950) तक अध्यक्ष रहे। उन्हें सन 1946 में भारत के संविधान सभा में भी सम्मिलित किया गया।

आजादी के बाद सन 1948 में उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए पट्टाभि सितारमैय्या के विरुद्ध चुनाव लड़ा पर हार गए। सन 1950 में उन्होंने आचार्य जे.बी. कृपलानी को हराकर कांग्रेस अध्यक्ष पद हासिल किया पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के साथ वैचारिक मतभेद के कारण उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया।




सन 1952 में वे लोक सभा और सन 1956 में राज्य सभा के लिए चुने गए। इसके बाद ख़राब स्वास्थ्य के चलते उन्होंने सक्रीय सार्वजानिक जीवन से संन्यास ले लिया। सन 1961 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया।

देश के विभाजन पर उनका विचार/His thoughts on the partition of the country

Purushottam Das Tandon in Hindi



12 जून 1947 को कांग्रेस कार्य समिति ने देश के विभाजन को स्वीकार कर लिया। जब 14 जून इस प्रस्ताव को अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के समक्ष मंजूरी के लिए रखा गया तब इसका विरोध करने वालों में से एक पुरुषोत्तम दास टंडन भी थे। उनका कहना था कि विभाजन स्वीकार करने का मतलब था अंग्रेजों और मुस्लिम लीग के सामने झुकना। उन्होंने कहा विभाजन से किसी का भी भला नहीं होगा – पाकिस्तान में हिन्दू और यहाँ भारत में मुसलमान डर के वातावरण में जीवन व्यतीत करेंगे।

हिंदी के समर्थक/Hindi supporters

हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन का बड़ा योगदान था। हिंदी प्रचार सभाओं के माध्यम से उन्होंने हिंदी को अग्र स्थान दिलाया। गाँधी और दूसरे नेता हिन्दुस्तानी (उर्दू और हिंदी का मिश्रण) को राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे पर उन्होंने देवनागरी लिपि के प्रयोग पर बल दिया और हिंदी में उर्दू लिपि और अरबी-पारसी शब्दों के प्रयोग का भी विरोध किया।


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हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा प्राप्त कराया- पुरुषोत्तम दास टंडन की जीवन कहानी -Purushottam Das Tandon in Hindi
पुरुषोत्तम दास टंडन Purushottam Das Tandon in Hindi उत्तर प्रदेश, भारत के एक स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्हें हिंदी के लिए भारत की राजभाषा का दर्जा प्राप्त करने के प्रयासों के लिए व्यापक रूप से याद किया जाता है। उन्हें राजर्षि की उपाधि दी गई। उन्हें लोकप्रिय रूप से यूपी गांधी के रूप में जाना जाता था।
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