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चोल साम्राज्य मे साहित्य एवं कला- Chola dynasty in Hindi

चोल साम्राज्य मे साहित्य एवं कला- Chola dynasty in hindi चोल साम्राज्य मे साहित्य/Literature in the Chola Empire चोल साम्राज्य मे धर्म/Religion in the Chola Empire



चोल साम्राज्य मे साहित्य एवं कला- Chola dynasty in Hindi


चोल राजवंश इतिहास में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजवंशों में से एक था। मौर्य साम्राज्य के अशोक द्वारा छोड़ी गई तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के इस तमिल राजवंश के सबसे पुराने संदर्भ हैं।

आधिकारिक भाषाएँ: तमिल, संस्कृत
सरकार: राजशाही
ऐतिहासिक युग: मध्य युग

चोल साम्राज्य मे साहित्य/Literature in the Chola Empire


तमिल साहित्य में कंबन ने रामायण, पुगालिंदी ने नलबेंबा, ज्ञानगोंदुर ने कल्लादानर की रचना की। जयागोंदान कुलोत्तुंग प्रथम के राजकवि थे। इनकी रचना कलिंगन्तुपणीं थी। सेक्कीललार कुलोत्तुंग प्रथम के दरबार में रहता था। उसने पेरीयापुराणम की रचना की। वेंकट माधव ने परांतक प्रथम के संरक्षण में ऋग्र्थदीपिका की रचना की। चोल शासक वीर राजेन्द्र को भी महान् तमिल विद्वान् बताया गया है।

चोल साम्राज्य मे धर्म/Religion in the Chola Empire


इस काल में बौद्ध धर्म का ह्रास होने लगा। पाल शासक बौद्ध धर्म के थे और उनके काल में बंगाल में इस धर्म का प्रभाव बना रहा। पाल राजाओं के पतन के बाद बौद्ध धर्म का भी पतन हो गया और बौद्ध धर्म अपने देश से ही समाप्त हो गया।

जैन धर्म की स्थिति, बौद्ध धर्म की अपेक्षा अच्छी थी। यद्यपि उत्तर भारत में इसकी लोकप्रियता कम हो गई परन्तु पश्चिम और दक्षिण भारत में यह लोकप्रिय बना रहा और इसे राजाश्रय प्राप्त हुआ। चालुक्य शासकों ने जैन धर्म को प्रोत्साहन दिया और आबू पर्वत पर मंदिरों का निर्माण कराया। नवीं और दसवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जैन धर्म का बड़ा प्रचार हुआ। कर्नाटक के गांग शासकों ने जैन धर्म को प्रोत्साहन दिया। जैन धर्म की एक विशेषता यह रही है की समय के अनुसार वन अपने को ढालता रहा है और ब्राह्मण धर्म के काफी निकट आ गया। यही कारण है की बौद्ध धर्म अपने देश में भी मृत हो गया, जबकि जैन धेम आज भी जीवित-जागृत धर्म है।

Chola dynasty in Hindi


इस काल में हिन्दू धर्म की उन्नति हुई। शिव और विष्णु प्रमुख देवता बन गए। शिव और विष्णु के अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया। इसी काल में शक्तिपूजा का प्रचलन भी बढ़ा। शक्ति की चंडी, महाकाली, दुर्गा आदि विभिन्न रूपों में उपासना की गयी और इन मंदिरों का निर्माण किया गया। त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) गणेश और सूर्य मंदिरों का भी निर्माण किया गया। विभिन्न देवी-देवताओं का प्रचलन होते हुए भी धार्मिक क्षेत्र में सहिष्णुता की भावना बनी रही। अलवार और नयनार संतों ने भक्ति आंदोलन प्रारम्भ किया। विष्णु उपासक अलवार एवं शिव उपासक नयनार कहलाते थे।

शंकराचार्य ने हिन्दू दर्शन की पुनर्व्याख्या की और अद्वैतवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उन्होंने बौद्ध और जैन धर्म को चुनौती दी और अनेक बार शास्त्रार्थ किये। शांकराचार्य के वेदान्त का दर्शन जनसाधारण की समझ में न आ सका। ग्यारहवीं शताब्दी में रामानुज ने अद्वैतवाद के स्थान पर द्वैतवाद के सिद्धांत का प्रचार किया और दक्षिण भारत में भक्ति-आन्दोलन का सूत्रपात हुआ। यह आन्दोलन आगे चलकर उत्तरी भारत में बड़ा लोकप्रिय हुआ। बारहवीं शताब्दी में एक और आन्दोलन आरम्भ हुआ जिसे लिंगायत कहते हैं। लिंगायत संप्रदाय की स्थापना बासव ने की। इस संप्रदाय का वर्णन बासव पुराण में किया गया। लिंगायत शिव के उपासक थे और मुक्ति प्राप्त करने के लिए भक्ति को आवश्यक मानते थे। इन्होंने जातिप्रथा की आलोचना की और उपवास तथा बलिप्रथा को निरर्थक बताया।

चोल साम्राज्य मे शैव धर्म/Shaivism in the Chola Empire

माना जाता है कि कुल 63 नैयनार सन्त हुए। प्रथम नैयनार सन्त अप्पर थे। इनके बाद नानसंबंदर आये। ये तंजौर जिले के सिजली नामक स्थान पर पैदा हुए थे। ये कौन्डिन्य गोत्रीय ब्राह्मण थे। ये राजराज एवं राजेन्द्र चोल के समकालीन थे। तिरूमूलर एक महत्त्वपूर्ण सन्त थे। उन्होंने तेवारम और तिरूव्राचलर की रचना थी। सुन्दर मूर्ति एक महत्त्वपूर्ण सन्त थे। इनको शिव के प्रति वैसी ही भक्ति थी जैसे किसी घनिष्ठ मित्र के प्रति होती है। इसलिए उन्हें तम्बिरानतोलन (ईश्वर मित्र) की उपाधि दी गई। नबिअंडारनबि भी एक महत्त्वपूर्ण सन्त थे उन्होंने तिरुमुराई का संकलन किया। तिरुमुराई को पंचम वेद भी कहा जाता है और नबिअंडारनबि को तमिल व्यास कहा जाता है। अधिकतर चोल शासक कट्टर शैव थे। आदित्यचोल ने कावेरी नदी के दोनों किनारे शैव मंदिर स्थापित करवाये थे। राजाराम प्रथम ने वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था और शिवपाद शेखर की उपाधि ली थी। राजाराज प्रथम एवं राजेन्द्र प्रथम के समय इशानशिव और सर्वशिव जैसे शैव मंत्री नियुक्त हुए।

चोल साम्राज्य मे वैष्णव धर्म/Vaishnavism in the Chola empire


  • इस आन्दोलन के भावनात्मक पक्ष का प्रतिनिधित्व 12 अल्वार संतों ने किया। अल्वार का अर्थ होता है ईश्वर के गुणों में डूबाने वाला।
  • महत्त्वपूर्ण सन्त- प्रारम्भिक अल्वार संत पोयगई था। दूसरे तिरूमलिशई, तीसरे तिरूमंगई एवं चौथे पेरिपालवार हुए। केरल के शासक कुलशेखर भी अलवार थे। अलवारों में एक मात्र महिला अंदाल थी। आचायों ने अलवारों की व्यक्तिगत भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान किया। भक्ति का समन्वय कर्म एवं ज्ञान से हो गया।
  • सबसे पहला आचार्य नाथमुनी थे जिन्होंने न्याय तत्व की रचना की। परम्परा के अनुसार, वे श्रीरंग मंदिर में भगवान की मूर्ति में प्रवेश कर गए। यमुनाचार्य ने आगमों की महत्ता को प्रतिष्ठित किया और उन्हें वेदों का समकक्ष माना।
  • रामानुज- ये यमुनाचार्य के शिष्य थे। इनका जन्म कांची के पास पेरम्बदुर में हुआ। उन्होंने श्री भाष्य नामक ग्रन्थ की रचना की और विशिष्टताद्वैत का दर्शन दिया। रामानुज पूर्व मीमांसा एवं उत्तर मीमांसा में कोई अन्तर नहीं समझते थे। उनके विचार में उत्तर मीमांसा के अध्ययन से पहले पूर्व मीमांसा का अध्ययन आवश्यक है। वे सामान्य एवं विशेष भक्ति में अन्तर स्थापित करते हैं और ऐसा कहते हैं कि सामान्य भक्ति ईश्वर का निरन्तर ध्यान है एवं विशेष भक्ति ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान है। माना जाता है कि चोल शासकों से उनका मतभेद हो गया (कुलोत्तुंग प्रथम एवं कुलोत्तुंग द्वितीय), इन्हें कुलोत्तुंग प्रथम के विरोध का सामना करना पड़ा, उन्हें श्रीरंगम् छोड़ना पड़ा। माना जाता है जब कुलोत्तुंग द्वितीय ने गोविन्दराज की मूर्ति को फिकवा दिया था तो रामानुज ने उसे तिरुपति के मंदिर में स्थापित किया। रामानुज ने भक्ति संप्रदाय एवं हिन्दू धर्म के बीच सेतु का कार्य किया। यद्यपि रामानुज उच्चवर्ग के लिए विशेषाधिकार चाहते थे किन्तु वे शूद्रों को मंदिर प्रवेश से वर्जित नहीं करते थे।
  • निम्बाकाचार्य- रामानुज के समकालीन थे, उनका जन्म बेलारी जिला के निम्बापुर गाँव में हुआ था। वे तेलुगु ब्राह्मण थे किन्तु उनका अधिकांश समय वृन्दावन में बीता।
  • माधवाचार्य- इनका जन्म दक्षिणी कन्नड़ जिले के उदिची तालुक में हुआ था। इन्हें वायु का अवतार माना गया है। तेरहवीं एवं चौदहवीं सदी में रामानुज के अनुयायियों में फूट पड़ गई। उत्तरी शाखा बडगलई एवं दक्षिणी शाखा तेंगलई कहलायी। वडगलई-तमिल भाषा का प्रयोग करते थे जबकि तेंगलई-संस्कृत भाषा का प्रयोग करते थे। वैष्णव एवं शैव मतों का व्यापक प्रचार हुआ। इसमें अलवारों एवं नयनारों की प्रबल भूमिका थी। अधिकतर चोल कट्टर शैव थे। चोल नरेश आदित्य प्रथम ने कावेरी के किनारे शिव मंदिर का निर्माण कराया। शैव संत नंबी अंदाल नंबी ने शैवमंत्रों को धार्मिक ग्रंथों में शामिल किया। ये राजराज प्रथम एवं राजेन्द्र के समकालीन थे। परांतक प्रथम ने दभ्रसभा का निर्माण किया। वैष्णव मत के प्रमुख आचार्य काफी समय तक श्रीरंग मंदिर में रहे, उन्होंने विशिष्टाद्वैत मत का प्रचार किया। कुलोत्तुंग द्वितीय चिदम्बरम मंदिर से गोविन्दराज विष्णु की मूर्ति को समुद्र में फिंकवा दिया। इसे रामानुज ने पुन: उठाकर इसे तिरुपति के विशाल वैष्णव मंदिर में स्थापित कराया। रामानुजाचार्य ने भक्तिसंप्रदाय एवं हिन्दू धर्म के मध्य सेतु का काम किया। 13वीं सदी में कन्नड़ में धर्मोपदेश देने वाले माधव ने भी धर्म के साथ भक्ति का संतुलन बैठने की कोशिश की। माधव के अनुसार, विष्णु अपने भक्तों पर अनुग्रह अपने पुत्र वायु देवता द्वारा करते हैं। रामानुजाचार्य उच्च वेर्न हेतु विशेष सुविधा स्वीकार करते हुए भी इस बात के विरुद्ध थे की शूद्रों को मंदिर में प्रवेश से वंचित किया जाए। धवलेश्वरम से चोलों के स्वर्ण सिक्के के ढेर मिलें हैं।

चोल साम्राज्य मे चोल कला/Chola art in the Chola empire

Chola dynasty in Hindi



चोल कला की विशेषताएं मंडप, विमान, गोपुरम थी। चोल कला द्रविड़ शैली पर आधारित थी। चोल स्थापत्य की प्रशंसा करते हुए फर्ग्युसन ने कहा है की चोल्कलिन कारीगर राक्षस की तरह सोचते थे एवं जौहरी की तरह तराशते थे। प्रारंभिक मंदिरों में तिरुकट्टालाई का सुन्दरेश्वर मंदिर था। रतमलाई में विजयालय चोलेश्वर मंदिर भी स्थापत्य का सुन्दर उदाहरण है। राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर/वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया। पर्सी ब्राउन ने इस वृहदेश्वर मंदिर के विमान को भारतीय वास्तुकला का निकष माना है जबकि गंगैकोंडचोलपुरम के वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण राजेन्द्र प्रथम द्वारा कराया गया। पर्सी ब्राउन ने इस मंदिर को गीतों की तरह संवेदना उत्पन्न करने वाला महान् कलात्मक निर्माण कहा है। 
अन्य मंदिरों में तंजौर स्थित दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर है। चोलकाल में मूर्तिकला का भी विकास हुआ। तंजौर स्थित नटराज शिव की कांस्य मूर्ति इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। पार्वती स्कंद में कार्तिकेय एवं गणेश आदि देवताओं की कांस्य मूर्तियाँ भी निर्मित की गई। भित्ति चित्रकला में वृहदेश्वर मंदिर के दीवारों पर अजंता की चित्रकला का प्रभाव दिखाई देता है|

इस प्रकार नवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच का यह काल आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से बड़ा महत्त्वपूर्ण है। इस समय देश में सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में महान् परिवर्तन हुए। अनेक मन्दिरों के निर्माण से कला को प्रोत्साहन मिला।

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