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जीवविज्ञानी हमारे बीरबल साहनी की जीवनी -Birbal Sahni in Hindi

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जीवविज्ञानी हमारे बीरबल साहनी की जीवनी -Birbal Sahni in Hindi


बीरबल साहनी FRS एक भारतीय शांतिदूत थे जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के जीवाश्मों का अध्ययन किया था। उन्होंने भूविज्ञान और पुरातत्व में भी रुचि ली। उन्होंने 1946 में लखनऊ में बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पलायोबोटनी की स्थापना की।


Birbal Sahni in Hindi

जन्म: 14 नवंबर 1891, भीरा, पाकिस्तान
निधन: 10 अप्रैल 1949, लखनऊ
क्षेत्र: पैलोबोटनी
पत्नी: सावित्री सूरी
शिक्षा: लंदन विश्वविद्यालय (1919),

जीवविज्ञानी हमारे बीरबल साहनी की जन्म एवं शिक्षा/Birbal Sahni Hindi



डॉ. बीरबल साहनी का जन्म पश्चिमी बंगाल के शाहपुर जिले के भेडा ग्राम में प्रो।रुचिराम साहनी के घर 14 नवम्बर 1891 को हुआ था।डॉ. बीरबल साहनी अपने पिता प्रो।रुचिराम साहनी की तीसरी सन्तान थे। पिता प्रो।रुचिराम स्वयं लाहौर के राजकीय कॉलेज में रसायनशास्त्र के प्राध्यापक थे। वे बहुत बड़े विद्वान शिक्षाशास्त्री और समाजसेवी थे अत: बालक बीरबल को घर तथा बाहर वैज्ञानिक वातावरण प्राप्त हुआ जो उनकी उद्योंमुख मानसिक एवं बौद्धिक वैज्ञानिक अभिरुचियो के विकास एवं प्रस्पुरण में सहायक सिद्ध हुआ। इस प्रकार महान वैज्ञानिक बीरबल साहनी (Birbal Sahni) की रूचि निरंतर वैज्ञानिक विषयों के प्रति उन्मुख होती गयी और जैसे तैसे समय व्यतीत होता गया, बीरबल साहनी में विज्ञान के प्रति जिज्ञासा, अनुराग और अभिरुचि में स्वाभाविक वृद्धि होती चली गयी। स्वभाव से ही बालक बीरबल साहनी प्रकृति का पुजारी था। वह हिमालय पर्वत की श्रुंखलाओ की प्राकृतिक शोभा को घंटो खड़े होकर निहारा करता था। बचपन से ही उनकी पेड़-पौधों में गहन रूचि थी। उनके पिता चाहते थे कि वह IAS बनकर किसी उच्च पद पर प्रतिष्टित हो किन्तु उन्हें वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अनुसन्धान करने की धुन सवार थी। वह पता लगाना चाहते थे कि वृक्ष धरती में दबकर कैसे पत्थर बन जाते है। बीरबल साहनी (Birbal Sahni) ने लाहौर के सेंट्रल मॉडल स्कूल तथा राजकीय महाविद्यालय में शिक्षा ग्रहण की। लाहौर में वह प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री प्रो। शिवराम कश्यप के प्रिय छात्र थे। पंजाब विश्वविद्यालय में बी।एस।सी। परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वो सन 1918 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में उच्च अध्ययन हेतु चले गये जहा उन्होंने “एमानु अल कॉलेज” से ट्राईपास उपाधि प्राप्त की।


Birbal Sahni शोधकार्य-Birbal Sahni in Hindi



डॉ. बीरबल साहनी ने प्रो।सर एल्बर्ट चार्ल्स स्वीर्ड के मार्गदर्शन में शोधकार्य आरम्भ किया। सर अल्बर्ट प्रसिद्ध पूरा-वनस्पति (पोलियो-बोटनिस्ट) तथा महान वैज्ञानिक थे। इस प्रकार अन्वेषण और शोधकार्य के क्षेत्र में बीरबल साहनी को सुयोग्य एवं समुचित मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।डॉ. बीरबल साहनी म्यूनिख भी गये जहा उन्होंने प्रसिद्ध वनस्पतिशास्त्री प्रो।के।गोनल के निर्देशन में अनुसन्धान किया। लन्दन विश्वविद्यालय में उन्हें बी।एस।सी। की उपाधि प्राप्त हुयी। उनका प्रथम शोध-पत्र वनस्पति विज्ञान के प्रख्यात पत्र “न्यू फाईढोलांसिस” में प्रकाशित हुआ था।डॉ. बीरबल साहनी ने माता-पिता से आर्थिक सहायता प्राप्त किये बिना मात्र छात्रवृति पर अपना अध्ययन काल व्यतीत किया। कैम्ब्रिज में पढ़ते हुए उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय में MSc और DSc उपाधियाँ तथा रोयाल सोसाइटी से शोधार्थ आर्थिक सहायता प्राप्त की और बड़े बड़े वेत्ताओ के निकट सम्पर्क में आये। सन 1919 में लन्दन विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से अलंकृत किया। यह सम्मान उनको “फासिस-प्लांट्स” प्रस्तरी भुत वृक्ष नामक प्रबंध पर प्राप्त हुआ। बाद मेंडॉ. बीरबल साहनी ने वृक्ष के तने को पत्थर में रूपांतरित करने का सफल प्रयोग किया। सन 1929 में कैब्रिज विश्वविद्यालय में उन्हें MCD की विशेष उपाधि से सम्मानित किया।डॉ. बीरबल साहनी ने सर्वप्रथम जीवित वनस्पतियों पर अनुसन्धान किया। तत्पश्चात भारतीय वनस्पति अवशेषों पर पुन: जांच शुरू की। उन्होंने कई भारतीय वनस्पति अवशेषों का अन्वेषण किया, जिसका विस्तृत विवरण “फिलोसोफिकल ट्रांससेक्शन” और कई अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ। उनके अन्य अनुसन्धान कार्य “महाद्वीप विभाजन सिद्धांत” “दक्षिण पठार की आयु” “ग्लोसीपटरीस वनस्पतियों की उत्पति के पश्चात हिमालय का उत्थान” आदि जटिल समस्याओं के हल करने में सहायक सिद्ध हुए। उन्होंने पुरातत्व संबधी भी कई अन्वेषण किये। रोहतक के निकट ईसा के 100 वर्ष पूर्व यौधेय राजाओं की टकसाल के विषय में भी उन्होंने अनुसन्धान किया। इस प्रकार डॉ. बीरबल साहनी वनस्पति विज्ञानी होने के साथ भू-वैज्ञानिक भी थे। इन दो विषयों में विविध अनुसन्धानो के द्वारा उन्होंने प्राचीन इतिहास के अज्ञात तथ्यों का भी पता लगाया।


बीरबल साहनी की प्रोफेसरी तथा विवाह/Birbal Sahni in Hindi




डॉ. बीरबल साहनी (Birbal Sahni) 1919 में भारत लौटने पर महामना मालवीय जी से प्रेरणा ग्रहण कर बनारस विश्वविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक नियुक्त हुए। 1920 मेंडॉ. बीरबल साहनी का विवाह पंजाब के राय बहादुर सुंदरदास की सुपुत्री सावित्री सुरी से हो गया।डॉ. बीरबल साहनी की धर्मपत्नी सावित्री न केवल उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखती थी बल्कि उनके कार्य में भी सहयोग देती थी। वह जीवाश्मो के चित्र बनाती और फोटो उतारती थी। विवाह के पश्चातडॉ. बीरबल साहनी पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर में वनस्पति शास्त्र के अध्यापक नियुक्त किये गये किन्तु एक वर्ष बाद सन 1921 में लखनऊ विश्वविद्यालय में उन्हें नये वनस्पति शास्र विभाग के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। लखनऊ विश्वविद्यालय में कार्यरत रहते हुए वे सन 1933 में विज्ञान संकाय के अध्यक्ष नियुक्त किये गये। सन 1943 में लखनऊ में भूगर्भ विभाग स्थापित होने पर वे उसके आचार्य नियुक्त किये गये। प्रोफेसर साहनी ने लखनऊ में बहुत अध्यवसाय एवं लगन से कार्य किया। वे रात-रात भर अपनी प्रयोगशाला में कार्य करते रहते। वे एक अध्यवसायी अनुसन्धानकर्ता ही नही थे बल्कि एक गुणवान एवं सफल अध्याप्ज भी थे।

अध्यापक के रूप उनकी ख्याति समस्त भारत में व्याप्त थी और उनके नाम से आकर्षित होकर भारत भर के अनेक स्थानों से विद्यार्थी लखनऊ विश्वविद्यालय में आते थे। प्रोफेसर साहनी अपने छात्रों को नवीनतम बातो की जानकारी देते और सिखाते तथा अज्ञात कारणों की खोज की प्रेरणा देते थे।डॉ. बीरबल साहनी ने एक पूरा-वनस्पति संस्थान स्थापित करने का स्वप्न देखा था। उनका विचार था कि यह अनुसन्धानशाळा विश्व के वैज्ञानिकों का अनुसन्धान केंद्र बने। उनके ही विचार का परिणाम है लखनऊ में बीरबल साहनी वनस्पति संस्थान की स्थापना हुयी जिसके तत्वाधान में 1946 में प्रयोगशाला स्थापित हुयी, जिसकी आधार शिला 3 अप्रैल 1945 को पंडित जवाहर लाल नेहरु ने रखी। इस अनुसन्धानशाला की उन्नति हेतुडॉ. बीरबल साहनी ने अमेरिका, यूरोप, इंग्लैंड और कनाडा आदि देशो का भ्रमण किया था।


उपाधि और सम्मान/Birbal Sahni in Hindi




  1. डॉ. बीरबल साहनी ने जीवनपर्यन्त जो उपाधि और सम्मान प्राप्त किया वह इस प्रकार है। 1919 में लन्दन विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से अलंकृत किया।
  2. 1921 में कम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने उन्हें SCD की विशेष उपाधि से सम्मानित किया।
  3. 1936-37 में लन्दन रॉयल सोसाइटी ने उन्हें फेलो निर्वाचित किया।
  4. 1921 में लखनऊ विश्वविद्यालय में उन्हें नये वनस्पति शास्त्र विभाग के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया।
  5. 1933 में विज्ञान संकाय के अध्यक्ष नियुक्त किये गये।
  6. 1943 में लखनऊ के भूगर्भ विभाग स्थापित होने पर उसके आचार्य नियुक्त हुए।
  7. 1930 और 1935 में विश्व वनस्पति कांग्रेस की पूरा-वनस्पति शाखा के उपाध्यक्ष नियुक्त हुए।
  8. 1921 और 1928 में दो बार भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित किये गये।
  9. राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के 1937-38 तथा 1943-44 में प्रधान रहे।

बीरबल साहनी का निधन -

डॉ. बीरबल साहनी को अनुसन्धानशाला की स्थापना के शुभ अवसर पर विश्व के अनेक वैज्ञानिकों की ओर से बधाईया और शुभकामना संदेश प्राप्त हुए किन्तु दुर्भाग्यवश इस संस्था को बड़ा धक्का लगा जबकि 10 अप्रैल 1949 कोडॉ. बीरबल साहनी का निधन हो गया। देश के इस सच्चे सपूत का मात्र 58 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनकी स्मृति में विज्ञान के विविध क्षेत्रो में सराहनीय कार्य करने वाले वैज्ञानिकों को बीरबल साहनी स्मृति पुरुस्कार प्रदान किये जाते है।

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